बचपन

सो रहा था मैं की कौन्धी एक सौन्धी सी महक ,
गर्जना थी बादलों की
और बून्दो की चहक.

शनै: शनै: काला वर्ण आसमां का हो रहा .
गर्मी का प्रताप मीठे
अंधकार में खो रहा .

देख बून्दो को बरसते ,
बच्चे खुल के खिलखिलाते ,
और जब बिजली कडकती,
मां से आके लिपट जाते.

ज्यों ज्यों मिट्टी भीगती है ,
मन ये मेरा भीग जाता.
सूंघ ये मिट्टी की खुश्बू ,
अपना बचपन याद आता.

पहली बून्द गिरते ही ,
आंगन में दौड़ जाते थे.
जन्मदिन की तरह ही,
“बारिशें” मनाते थे.

आज बून्द देख के ही ,
मन प्रफुल्लित हुआ जाता.
सूंघ के मिट्टी की खुश्बू ,
अपना बचपन याद आता.

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