“औकात में रह”

पितृसत्ता की प्रथम पोषक एक बेटे की माँ होती है, और पितृसत्ता की सबसे पौष्टिक खुराक़ उसी माँ की बेटी।

#नहीं समझे? 

स्कर्ट को फैशन मनना एक समस्या है। लेकिन बलात्कार मात्र एक समस्या या बुराई नहीं है। ये दोगले समाज का आइना है। बलात्कार भूख़ मिटाने के लिए नहीं होते…

बदला लेने या औकात में रह… वाली गाली स्थापित रखने के लिए बलात्कार किया जाता है।

“औकात में रह”

इस बात को बार बार याद दिलाते रहने के लिए माँ, बाप, भाई, नातेदार भरपूर कोशिश करते हैं। राखी का त्यौहार हो, कन्यादान हो या विधवा विलाप की रस्म… हर जगह यही साबित किया जाता है कि “औकात में रह”…

जब कोई इस औकात से बहार जाने की हिमाकत करता है तो उसे सबसे पहला तंज माँ करती है… और जब कोई वाकई अपनी औकात पर आ जाता है तो उसका गला उसका बाप दबाता है। ये है पितृसत्ता।

#अब भी नहीं समझे?

उसके मरने के बाद मेरा कर्ज कौन चुकायेगा या मेरे मरने के बाद मेरी दौलत का मालिक कौन होगा… इस सवाल ने विवाह और परिवार को जन्म दिया। क्योंकि औरत चाहे तो अपने बच्चे के बाप की पहचान छुपा सकती है इसलिए उसको एक पुरुष के आधीन बंधा गया। जबकि पुरुष को ऐसी किसी बंदिश में नहीं रखा गया…। ये है पितृसत्ता।

बलात्कार पितृसत्ता के मंथन का सबसे घिनौना जहर है। इसका स्कर्ट से या बुर्के से कोई लेना देना नहीं है।

इस लाइन को फिर से पढ़िए.. चीख़ कर… जान लगाकर चीखिये और पढ़िए… बलात्कार का दोषी समाज है… पहनावा नहीं।


By Jitendra Rajaram

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