Arjun- Love story of a “Criminal”: Finale

By Amit Khare


 

कॉलेज का पहला साल खत्म होते ही हमें एक NGO की तरफ से ह्यूमन एब्नार्मल साइंस पर रिसर्च करने के लिए लखनऊ के एक हॉस्पिटल भेजा गया। यह पूरी छह लोगों की टीम थी जिसमे से दो थे मैं और देविका। एक साल के लंबे इन्तजार के बाद वह दिन आया जब हम साथ थे। दिल्ली से लखनऊ तक के सफ़र में धीरे-धीरे मैंने उससे बात करना शुरू की और एक बार जब वह शुरू हुई तो फिर उसने खत्म होने का नाम ही नहीं लिया। उसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था की वह इतना बोलती होगी। अक्सर हम लोगों के बारे में गलत राय बना लेते है जबकि हकीकत कुछ और ही होती है।

हम दोनों पूरे रास्ते भर बातें करते रहे, काफी हँसी मज़ाक हुआ, एक दूसरे को जानने का इससे अच्छा मौका और कोई हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मेरे बाबा लखनऊ के ही रहने वाले थे इसलिए वहाँ हमारा पुराना घर खाली पड़ा था। जब मैंने देविका को मेरे साथ मेरे घर पर ही रुकने के लिए बोला तो वह झट से मान गयी, मगर बदले में उसने एक शर्त रखी “मुझे उसे पूरा लखनऊ घुमाना पड़ेगा”। जिसे वह महज एक शर्त समझ रही थी मेरे लिए तो वह एक ऐसा सुनहरा मौका था जिसे में अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पलों में तब्दील कर सकता था।

चार दिन तक हम अपने प्रोजेक्ट में लगे रहे। प्रोजेक्ट खत्म होते ही अब मुझे अपना वादा पूरा करना था। उस रात हमने बैठकर सब प्लान किया कि कब कहाँ जाएँगे। मेरे पास पूरे दो दिन थे देविका से अपने दिल की बात कहने के लिए। अगले दिन सुबह होते ही हम लखनऊ की गलियों में निकल पड़े। जहाँ एक तरफ वह लखनऊ देखने में व्यस्त थी तो दूसरी तरफ मैं उसका दीदार किये जा रहा था। उसके साथ वक्त ऐसे गुज़र रहा था जैसे हाथ से फिसलती रेत, कब आखरी रात आ गयी पता ही नहीं चला। अगली सुबह हम वापिस दिल्ली जाने वाले थे….ये आखरी रात थी मेरे पास अपना हाल-ए-दिल बयाँ करने के लिए।

उस शाम वह अपनी किसी फ्रेंड के साथ शॉपिंग पर गयी हुई थी। मैंने बाजार जाकर कुछ कैंडल्स ली और और जितनी भी कला मेरे अन्दर थी पूरी मैंने उस कमरे को खूबसूरत बनाने में लगा दी जिसमे देविका रुकी हुयी थी। मैं बेसब्री से उसका इन्तजार कर रहा था। वह जैसे ही वापिस आई एक अजीब सी बैचैनी मुझे सताने लगी। मैंने खुद से वादा किया की अगर उसने मना कर दिया तो मैं इसे महज एक ख्वाब समझकर भूल जाऊँगा। वह जैसे ही अन्दर कमरे में गयी उसकी आँखें खुली की खुली रह गई। कमरे की हर दीवार पर मैंने अपने दिल की बात लिख दी थी। कभी-कभी अपने जज़्बातों को हम शब्दों की मदद से ज्यादा अच्छे से पेश कर पाते है। यह जानने के लिए की आख़िर उसकी प्रतिक्रिया क्या है, मैंने धीरे से अपने कदम कमरे की तरफ बढ़ा दिए..मैं जैसे ही उसके करीब पहुँचा उसने पलटकर मुझे लगे से लगा किया और बोली “मुझे तो मालूम ही नहीं था की कोई मुझसे इतना प्यार करता है, और अगर मैं यहाँ ना आती तो शायद कभी जान भी नहीं पाती”।

हाँ…उसने हाँ बोल दिया था और मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था। करीब पांच मिनट तक हम दोनों वैसे ही खड़े रहे। हर इंसान की यह ख्वाइश होती है की उसे एक अच्छा जीवनसाथी मिले और शायद मेरी तलाश देविका पर आकर खत्म हो गयी थी।

अगली सुबह हम दोनों वापिस दिल्ली के लिए निकल गए। वह सुबह एक अलग सा एहसास लेकर आई थी मेरी जिन्दगी में। कुछ दिनों बाद कॉलेज शुरू हो गए। हम रोज एक दूसरे से मिलते, साथ में वक्त बिताते; दिल्ली की कोई ऐसी जगह नहीं बची थी जहाँ हमने एक दूसरे से अपने प्यार का इजहार न किया हो।

समय बीतता गया। कॉलेज का दूसरा साल भी अपने अपने आखरी पड़ाव पर था। हमारे घरवाले भी इस रिश्ते से खुश थे, बल्कि उन्होंने तो हमारी पढ़ाई पूरी होने के बाद हमारी शादी तक करने का निर्णय ले लिया था। सब कुछ ठीक चल रहा था…फिर अचानक वक्त ने ऐसी करवट ली जिसका मुझे जरा सा भी अंदाजा नहीं था। मेरे बाबा को बिज़नेस में बहुत बड़ा घाटा हो गया। हम पर मार्केट से बहुत बड़ा क़र्ज़ था जिसके चलते हमारी पूरी प्रॉपर्टी घर सब बिक गया। जब देविका के डैड को इस बात का पता चला तो उन्होंने मेरा और देविका का रिश्ता तोड़ दिया। सबकुछ जैसे खत्म सा हो गया।

मैं माँ और बाबा को वापिस लखनऊ छोड़ने जा रहा था ताकि वह ये सब भुला सके, पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था; बाबा ने रास्ते में ही हमारा साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया। मानो ईश्वर मेरी सहनशक्ति परखने की कोशिश कर रहा था। मैं सेकंड इयर के फाइनल एग्जाम्स नहीं दे पाया। दो महीने बाद पता चला माँ को ब्लड कैंसर है। उन्हें किसी तरह इलाज ले लिए फिर से यहाँ लेकर आया। पैसों की परेशानी सामने आने लगी। पैसों की व्यवस्था तो किसी तरह हो गयी पर माँ नहीं रही और फिर मैं अब्दुल और सरताज के साथ मुम्बई भाग गया।

मुम्बई जाने के एक साल बाद तक देविका रोज मुझसे फ़ोन पर बात करती थी।
पर एक दिन उसका फ़ोन आया और अचानक से कहने लगी की “वह किसी
‘क्रिमिनल’ के साथ रिश्ता नहीं रखना चाहती, आईन्दा से उसे फ़ोन करने की कोशिश ना करूँ”।

एक झटके में सब खत्म हो गया। देविका ने मुझसे मेरे जीने की एक आखरी वजह भी छीन ली थी और फिर मेरे कदम एक ऐसे दलदल की तरफ बढ़ गए जिससे बाहर निकल पाना नामुमकिन था।

“क्रिमिनल”…बस दिल आ गया इस शब्द पर। एक साल के अन्दर ही इंडिया से लेकर दुबई तक “अर्जुन” का नाम चलने लगा। फिरोज के बाद अगर इस काम को कोई संभाल सकता था तो वो सिर्फ मैं था। बड़े-बड़े लोगों में उठना-बैठना, मीटिंग्स में जाना, ये मेरे लिए आम बात हो गयी थी।

और अब जब दो साल बाद दिल्ली वापिस आया तो किस्मत ने मुझे तुमसे मिलाया। नजाने क्यों तुमसे मिलकर ऐसा लगा जैसे देविका की परछाई मेरे सामने आ खड़ी हुई हो। तुम्हारी बातों में तुम्हारे स्पर्श में मैं देविका को महसूस कर सकता हूँ।

मैं बोलने में इतना मसगूल हो चुका था की मुझे पता ही नहीं चला कब नैना ने अपनी उँगलियाँ मेरे होठों पर टिका दी। हम बिलकुल शांत खड़े होकर बस एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे…जैसे किसी समंदर की गहराई नाप रहे हो और उसमे दफ़न को चुके किसी इतिहास की तलाश में हो। वह इतिहास जो हमारी आने वाली जिंदगी के नए अध्याय लिखेगा।

“मुझे नहीं पता मैं तुम्हारी जिंदगी में देविका की जगह ले पाऊँगी या नहीं, लेकिन ये वादा है मेरा…मैं तुम्हें इस काले साये से इतना दूर ले जाउंगी जहाँ किसी की परछाई भी हमारी खुशियों पर न पड़ेगी” नैना ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा।

नैना की इन बातों ने मेरी परेशानी और भी बड़ा दी थी। कैसे बताता उसे की ये रात शायद उसके साथ आखरी रात है। मैंने तय किया की सुबह उसके उठने से पहले ही वहाँ से निकल जाऊँगा। शायद उस समय यही सही था।

आधी रात यूँ ही बातें करते-करते निकल गयी। जब मैं सुबह उठा तो नैना सोई हुई थी…मैंने बिना कोई आवाज़ किये अपना बैग पैक किया और आखरी बार उसको देखने लिए उसके कमरे की तरफ गया पर नजाने क्यों मेरे कदम दरवाजे पर ही रुक गए, शायद इतनी हिम्मत नहीं थी मेरे अन्दर। मैंने अपने कदम वापिस ले लिऐ और चुपचाप वहाँ से निकल गया।

दिन चढ़ने लगा था और मेरे पास वक्त ज्यादा नहीं था। मुझे किसी भी तरह अब्दुल को ढूंढकर उसी दिन मुम्बई वापिस निकलना था। मैंने दिल्ली के हमारे सभी पुराने अड्डो पर छानबीन की पर अब्दुल का कोई सुराग नहीं लगा। ना ही किसी न्यूज़ चैनल और अखबार में उस दिन हुयी घटना का जिक्र था। दोपहर हो चुकी थी। मैं लगातार उसे ढूँढने की कोशिश कर रहा था, तभी किसी अनजान नंबर ने मेरे मोबाइल पे दस्तक दी, एक पल के लिए तो लगा जैसे नैना ही होगी। मैंने जैसे ही फ़ोन उठाया तो किसी जानी पहचानी आवाज़ ने मेरा नाम पुकारा-

“क्या रे अर्जुन…एक छोकरी क्या मिली तूने तो काम से जैसे सन्यास ही ले लिया”

“फिरोज भाई” मैंने दबी हुयी आवाज़ में कहा।

“बड़ी जल्दी पहचान लिया..अब पहचान ही लिया है तो मेरी बात ध्यान से सुन, अश्फाक को टपकाने के बाद तू तो वहाँ से उस छोकरी को लेकर भाग गया लेकिन पता है तेरे जाने के बाद वहाँ क्या हुआ? दिल्ली पुलिस ने आकर सबका एन्काउन्टर कर दिया और तेरे उस हरामजादे दोस्त ने अपनी जान बचाने के लिए कायरों की तरह सरेंडर कर दिया। अब इससे पहले की वह इंटेलिजेंस के सामने अपना मुँह खोले और हम सब के लिए फाँसी का फंदा तैयार करे, साले को जेल में ही जाकर ठोक दे”।

“और अगर मैं ऐसा न करू तो” इस बार मेरी आवाज़ में इतना जोर था जैसे मैं फिरोज के लिए बल्कि फिरोज मेरे लिए काम करता हो। वो दो कौड़ी का इंसान मेरे हाथों मेरे ही दोस्त का खून करवाना चाहता था।

“ठीक है जैसी तेरी मर्जी पर हाँ एक घंटे के अन्दर अपनी प्यारी बुलबुल की लाश पर आँसू बहाने जरूर आ जाना। बेचारी का तेरे सिवाय है ही कौन इस दुनिया में। काफी अच्छा घर है वेसे नैना का, अब अगर तू चाहता है की मैं इसे शमशान में तब्दील करूँ तो ठीक है”

जिसका डर था वही हुआ। मेरी वजह से नैना की जान पर बन आई थी। अब मेरे पास उसकी बात मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

“क्या करना होगा मुझे”..

“ये हुयी न बात…अब सुन, अब्दुल को बहुत सख्त निगरानी में रखा गया है। किसी को भी उससे मिलने की इजाज़त नहीं है, यहाँ तक की इंटेलिजेंस ने उसके बारे में किसी को भनक तक नहीं लगने दी। पर उसका भी इंतेजाम कर दिया है मैंने, तुझे उस तक पहुंचाने का काम करेगा उसी जेल का जेलर चंदेल। तू वहाँ कैद किसी बिरजू नामक कैदी से मिलने के बहाने ठीक एक बजकर पैंतालीस मिनट (1:45) पर अन्दर जाएगा। वहाँ से चंदेल तुझे सीधा अब्दुल के पास लेकर जाएगा। दो बजे जेल का लंच टाइम होता है और उस वक्त आस पास के सभी कैदी खाना खाने के लिए बाहर निकाले जाएँगे सिवाय अब्दुल के। ठीक 2:05 होते ही उसे शूट कर देना न एक मिनट कम न एक मिनट ज्यादा। दो बजकर दस मिनट पर जेल के बाहर एक धमाका होगा उसका फ़ायदा उठाकर तुम वह से भाग जाना और हाँ याद रखना जब तक चंदेल मुझे फ़ोन करके ये खुशखबरी न सुना दे तब तक वहाँ से हिलना भी मत, अगर कोई भी चालाकी की तो में इसकी वो हालात करूँगा की तेरी रूह भी इसे पहचानने से इनकार कर देगी। बाकी तो तू जानता ही है “काम खत्म मतलब चंदेल खत्म”।

फ़ोन रखते ही मैंने घड़ी देखी तो 12:30 बज रहे थे। समय कम था। मैं एक घंटे के अन्दर फिरोज के बाताए पते पर पहुँच गया और जेल के बाहर खड़े होकर 1:45 होने का इंतजार करने।

रणजीत- मतलब नैना के लिए तू अब्दुल को मारने जा रहा था।

उस वक्त मैं नहीं जानता था मैं क्या करने वाला हूँ, बस मेरे लिए कुछ भी करके नैना को बचाना जरुरी था। अब सिर्फ वक्त ही हमें बचा सकता था।

1:45 होते ही मैंने अपने कदम जेल की तरफ बड़ा दिए। अन्दर जाते ही मेरी मुलाकात चंदेल से हुई, उसने मुझे साइलेंसर के साथ एक गन दी और अब्दुल तक लेकर गया। मुझे देखते ही अब्दुल की सारी मायूसी एक झटके में दूर हो गयी। 2:05 होते ही बड़ी आसानी से मैंने चंदेल की खोपड़ी पे गन टिका दी और उससे जैसा-जैसा फिरोज को बोलने के लिए कहा वह तोते की तरह बोलता गया।

“अपना फ़ोन मुझे दे और ये मेरी घड़ी अपने पास रख, अभी 2:10 होने में 3 मिनट बाकी है, बाहर धमाका होते ही तू अब्दुल के कपड़े पहनकर भाग जाना। पुलिस को लगेगा की अब्दुल फरार हो गया। इस तरह तेरी नौकरी भी बच जाएगी और जिंदगी भी” मैंने चंदेल को जेल में धक्का देते हुए कहा।

दोनों ने जेल में कपड़ो की अदला-बदला की और फिर धमाका होते ही जैसे ही पूरी फ़ोर्स बाहर की तरफ भागी हम भी उनके पीछे-पीछे वहाँ से भाग निकले।

“अगर उस चंदेल ने फिरोज को सारा सच बता दिया तो” अब्दुल ने चिंता जताते हुए कहा।

“उसके लिए उसे फिर से जन्म लेना पड़ेगा” मैंने हँसते हुए कहा।

“क्या मतलब”

“हमारे वहाँ से निकलने के ठीक 30 सेकण्ड बाद एक और धमाका हुआ होगा जिसने चंदेल की वो हालात की होगी की वह अगले सात जन्म तक याद रहेगा की कभी किसी दोस्त के हाथों एक दोस्त का खून नहीं करवाते”

रणजीत- अब समझ आया, जिस वक्त की तू बात कर रहा था वह असल में तेरी घड़ी थी। जो की घड़ी नहीं बल्कि एक टाइम बम था।

हाँ, उसका मरना जरुरी था। अब या तो पुलिस ये कभी नहीं जान पाती की जो मरा वह अब्दुल नहीं चंदेल था या फिर उन्हें पता लगने से पहले हम वहाँ से बहुत दूर जा चुके होते।

मैंने अब्दुल से अम्मी को लेकर स्टेशन पहुंचने के लिए कहा और खुद नैना को उस दरिंदे की कैद से आज़ाद कराने के लिए निकल गया। मैं जैसे ही वहाँ पहुँचा तो देखा दरवाजा खुला था और ऊपर उसके कमरे से कुछ आवाज़ें आ रही थी। मैं भागते हुए ऊपर गया और फिरोज के ठीक सामने जा पहुँचा। मुझे एकदम से देखकर उसने होश संभाला और अपने आदमियों को मुझे जान से मारने का आदेश देने लगा।

उसकी इस करतूत पर मुझे हँसी आ गयी और मेरा इस तरह हँसना उसकी परेशानी का सबब बन गया।

“मेरे ही दोस्तों से मुझे मारने के लिए बोल रहा है..हा हा फिरोज तू एक लावारिस कुत्ता है। दोस्ती क्या होती है वफादारी क्या होती है तू ये कभी नहीं समझेगा। मैं चाहता तो उसी वक्त नैना को यहाँ से ले जाता जिस वक्त तूने मुझे उसके बारे में बताया था, पर एक तू ही था जिसके जरिये मैं अब्दुल तक पहुँच सकता था। अब तू आराम से विदा ले और हाँ अगर अश्फाक मियां मिले तो उन्हें मेरा प्यार जरूर देना।

इससे पहले फिरोज अपनी गन लोड करता, एक ही झटके में मैंने पूरी गोलियाँ उसके सीने में उतार दी।

खून खराबा देखकर नैना घबरा गई। वह दौड़कर मेरे पास आई और मेरे सीने से लिपटकर रोने लगी। उसके लबों पर बस एक ही सवाल था “मेरी हिम्मत कैसे हुयी उसे छोड़कर जाने की” और हर बार उसके सवाल के बदले मैं उसे और कस कर अपने सीने से लगा लेता।

मैंने नैना को तुरंत उसका सामान पैक करने के लिए कहा और फिर वहाँ से हम सीधे स्टेशन पहुँच गए जहाँ अब्दुल और उसकी अम्मी पहले से ही हमारा इन्तजार कर रहे थे। 4:15 होते ही हमने कश्मीर जाने वाली ट्रेन पर सवार होकर दिल्ली की बेदर्द गलियों को कुछ वक्त के लिए अलविदा कह दिया।

कश्मीर पहुँचते ही वहाँ की सर्द हवाओं ने बड़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। अम्मी बहुत खुश थी क्योंकि उनके दोनों बेटे उनके पास थे और मैं, मुझे तो जैसे मेरा खोया हुआ परिवार वापिस मिल गया था। मैंने बचे हुए पैसों से शहर से दूर वहाँ की वादियों में एक छोटे से घर का इंतजाम किया और अब्दुल, अम्मी और नैना के साथ अपनी नयी जिंदगी की शुरुवात की।

बहुत दिन बाद खुशियों ने मेरी जिंदगी में दस्तक दी थी, मानो खुदा को मुझपर तरस आ गया हो। हर दिन जिंदगी में नयी खुशियाँ ले कर आ रहा था। अब्दुल और मैंने मिलकर एक ग़ैराज की शुरुवात की। नैना को वहाँ के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में नौकरी मिल गयी।

पूरा दिन हम अपने-अपने काम में वयस्त रहते और रात होते ही जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने को हर उस खूबसूरत लम्हें से भर देते जो हमारे प्यार को हर रोज नयी दिशा दे रहा था।

वक्त बीतता गया, आख़िरकार छह महीने बाद मैंने और नैना ने हमेशा के लिए एक दूसरे के हो जाने का फैसला लिया। नैना चाहती थी उसकी डोली दिल्ली से ही उठे, उस घर से जहाँ वह बचपन में गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाया करती थी। उसकी जगह कोई भी होता तो शायद यही चाहता।

अगले ही दिन हम वापिस दिल्ली आ गए। अम्मी ने मजहब की दीवार को तोड़ते हुए शादी की सारी रस्में हिंदू तौर-तरीकों से निभाने का जिम्मा लिया। अब्दुल ने शादी के कार्ड्स छपवाए और मेरे कुछ दोस्तों और परिजनों को कार्ड्स देने के लिए लखनऊ रवाना हो गया।

“29 अक्टूबर 2005”

ठीक दो दिन बाद दिवाली थी और फिर 13 दिन बाद हमारी शादी। हम दिवाली और अपनी शादी की खरीददारी करने के लिए साउथ दिल्ली के सबसे व्यस्त इलाके सरोजनी नगर मार्केट आये हुए थे। मैंने नैना को शादी का लाल जोड़ा दिलाया और अम्मी के लिए नयी साड़ियां ली। हम घर वापिस जाने ही वाले थे तभी मुझे अब्दुल का फ़ोन आया, भीड़-भाड़ होने के कारण वहाँ काफी शोर हो रहा…मैंने नैना को दो मिनट वहीं रुकने के लिए कहा और मैं अब्दुल से बात करते हुए धीमे-धीमे आगे बढ़ने लगा। मुझे कुछ भी साफ़ नहीं सुनाई दे रहा था बस वह बार-बार मुझे घर जाने के लिए बोल रहा था, एक अजीब सी घबराहट थी उसकी आवाज़ में।

इससे पहले की मैं कुछ समझ पाता एक सनसनाहट मेरे कानों में गूंजने लगी और अगले ही पल मैं जमीन पर बिखर गया। चारों तरफ सिर्फ चींख पुकार थी। तबाही का ऐसा मंजर जिसने ना जाने कितनो को मौत की नींद सुला दिया। मेरी आँखे लगातार नैना को ढूँढ़ रही थी। मैंने देखा वह मुझसे थोड़ी ही दूर बेजान पड़ी…मैंने अपनी पूरी ताकत से उसका नाम पुकारा तो उसने अपनी आँखें खोली और मेरी तरफ देखने लगी। वह अब भी मुस्कुरा रही थी, जैसे मुझसे विदा लेना चाहती हो। मेरे आँसू मेरी आँखों में ही सूखने लगे। सब कुछ धुंधला-धुंधला सा नज़र आ रहा था। भगवान् की तो जैसे आदत सी हो गयी थी मुझसे समय-समय पर मज़ाक करने की। मेरी आँखे धीरे-धीरे बंद होने लगी और अचानक वो सारे ख्वाब नज़र आने लगे जो मैं नैना के साथ देखा करता था। अगले ही पल मैं बेहोश हो गया।

जब मुझे होश आया तो मैं हॉस्पिटल में था। मेरे सिर में और हाथ में चोट आई थी। मैंने पूरे हॉस्पिटल छान मारा पर नैना कहीं नहीं मिली। मैं पागलो की तरह यहाँ-वहाँ भटकता रहा, फिर सामने एक दीवार पर मेरी नज़र पड़ी तो देखा वहाँ काफी भीड़ लगी हुई थी। हादसे में मारे गए लोगों की लिस्ट लगी थी वहाँ।

इससे आगे बोलने की हिम्मत नहीं थी मुझमें। रणजीत ने मुझे गले से लगाया और अपनी शर्ट की बाँह से मेरे आँसु पोछने लगा।

रणजीत- बस कर यारा, कब तक खुद को यूँ तकलीफ देगा।

तकलीफ तो मैं अपनी किस्मत में ऊपर से ही लिखवा कर लाया था रणजीते, बस धरती पर आकर उसने अपना काम कर दिया।

दिल्ली में तीन जगह धमाके हुए जिसने मुझसे और मेरे जैसे न जाने कितने लोगों से सब कुछ छीन लिया। मैं कुछ दिन अकेला रहना चाहता था इसलिए मेरे कहने पर अब्दुल अम्मी को लेकर अपने गाँव चला गया।

उस दिन उनके जाने के बाद मैं शाम तक स्टेशन पर ही बैठा रहा। मैं वहां से जाने ही वाला था कि तभी पीछे से किसी की आवाज़ आयी-

“अर्जुन देवेश शेखावत” लखनऊ का एक सीधा साधा लड़का।

“22 साल के थे जब कॉलेज छोड़ ड्रग माफिया में शामिल हुए”
“23 साल के हुए तो किसी के छोड़ने के गम में ड्रग्स की तस्करी में जी-जान लगा दी और फिरोज के बाद हमीज़ का कारोबार संभालने के दावेदार बन गए”
“24 में वापिस दिल्ली आए और सिकंदर के बेटे अश्फाक को मार गिराया, पर अफ़सोस उसकी ही बेटी नैना से दिल लगा बैठे”

उसकी बात ख़त्म होते ही मैंने पलटकर देखा तो मेरी ही उम्र का एक लड़का खड़ा था।

उस अनजान शख्स ने एक ऐसे सच से पर्दा उठा दिया था जिससे मैं अब तक बेखबर था। उसने जो कुछ कहा मुझे उस पर जरा सा भी विश्वास नहीं हो रहा था।

“नैना और सिकंदर की बेटी..नामुमकिन…अगर ऐसा होता तो नैना कभी न कभी इस बारे में मुझे जरूर बताती” मैंने चिल्लाते हुए कहा।

“अब ये तो मुझे नहीं पता की उसने तुमसे इस बात का ज़िक्र क्यों नहीं किया…शायद उसे डर हो की कहीं वह तुम्हें खो न दे…ख़ैर ये कुछ सबूत है तुम्हारे खिलाफ जो मैं तुम्हें सौंपने आया हूँ। अब पुलिस तुम तक कभी नहीं पहुँच पाएगी” उसने एक फ़ाइल मुझे दी और जाने लगा”

“कौन हो तुम..नैना के बारे में कैसे जानते हो और क्यों मुझे बचाना चाहते हो” मैंने उसे रोकते हुए कहा।

“मैं कौन हूँ, क्या हूँ इससे कोई फर्क नहीं पड़ता अर्जुन; बस कोई है जो ये नहीं चाहता की तुम्हें जेल हो। शायद यही उसकी आखरी ख्वाइश है।” उसने जाते हुए कहा।

वह तो चला गया, पर सवालो का एक बबंडर मेरे अन्दर छोड़ गया। मुझे अब भी उस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। अगर नैना सिकंदर की बेटी थी तो उसने क्यों मुझे इस सच से दूर रखा? क्यों उसने अपने जिन्दा बाप को मरा हुआ बताया? क्यों उस दिन मॉल में उसने अपने भाई अश्फाक को ना तो पहचाना और न ही उसकी मौत से उसे कोई फर्क पड़ा? आखिर कौन था ये शख्स जो मेरी मदद करना चाहता था और किसके कहने पर? ना तब उन सवालों का कोई जवाब था और ना शायद आज है?

रणजीत- जवाब है अर्जुन। तेरे हर सवाल का जवाब है। शायद तुझे मेरी बातों पर यकीन ना हो, पर सच यही है।

ये उस वक्त की बात है जब हमीज़ और सिकंदर पार्टनर्स हुआ करते थे। दोनों का बिज़नेस काफी फल-फूल रहा था। सिकंदर ने दुबई के ही एक बिज़नेसमैन सलीम अंसारी की बेटी जुबेदा अंसारी से निकाह कर लिया। क्योंकि सलीम खुद एक बड़ा बिज़नेसमैन था इसलिए सिकंदर और हमीज़ को इस रिश्ते से काफी फ़ायदा हुआ। पांच साल बाद हमीज़ और सिकंदर की नज़र इंडिया पर पड़ी, उस वक्त अश्फाक महज तीन साल का था। क्योंकि सिकंदर पैदाईसी इंडीयन था इसलिए हमीज़ ने उसे कुछ महीनों के लिए इंडिया भेज दिया ताकि वह यहाँ आकर ड्रग्स के नेटवर्क को स्थापित कर सके। दिल्ली आकर उसने सूर्यप्रताप हंसराज की बेटी जया हंसराज से दूसरी शादी की। सूर्यप्रताप अपना कारोबार फैलाना चाहता था और सिकंदर ने इसके बदले जया से शादी करने की इच्छा जाहिर कर दी। सूर्यप्रताप के लिए ये सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट हो सकता था लेकिन जया की खूबसूरती पर सिकंदर का दिल आ गया था। सिकंदर ने साउथ दिल्ली में एक घर खरीदा और जया के साथ वहाँ रहने लगा।

कुछ महीनों बाद जब उसे लगा की इंडिया में उनका नेटवर्क लगभग तैयार हो चुका है तो वह बिज़नेस का बहाना बनाकर वापिस दुबई चला गया। वह हर महीने जया को कुछ पैसे और गिफ्ट्स भेजता रहता था ताकि उसका विश्वास उस पर बना रहे। एक साल बाद जब उसे पता चला की जया ने एक बेटी को जन्म दिया है तो वह भागकर इंडिया आया और कुछ दिनों के लिए वही रुक गया। उसके बाद वह हर दो महीने में दुबई से इंडिया आता, कुछ दिन वहीं रुकता और फिर वापिस चला जाता।

नैना सिर्फ दो साल की थी जब उसकी माँ को सिकंदर के क़ारोबार और उसकी पहली बीवी जुबेदा के बारे में पता चला। जया ने सिकंदर से अपने सारे रिश्ते ख़त्म कर लिए। पर सिकंदर अपनी बेटी से बहुत प्यार करता था इसलिए जब भी उसे समय मिलता उसकी एक झलक पाने के लिए वह दिल्ली आता और उसे देखकर वापिस चला जाता। नैना के लिए तो उसके डैड किसी एक्सीडेंट में मर चुके थे। सिकंदर के बारे में जया ने नैना को कभी भनक भी नहीं लगने दी।

समय बीतता गया। नैना अब बड़ी हो चुकी थी। वह कॉलेज से अपनी पढाई पूरी कर रही थी उसी बीच जया का देहांत हो गया। जया के चले जाने से सिकंदर को बहुत बड़ा झटका लगा। वह अन्दर ही अन्दर घुट रहा था, उसने काम पर भी ध्यान देना बंद कर दिया जिसके चलते हमीज़ को क़ारोबार में नुकसान होने लगा और फिर दो साल बाद उसने सिकंदर को उसका हिस्सा देकर अपना कारोबार अलग कर लिया। अश्फाक को यह बात नागवार गुजरी और उसने हमीज़ को सबक सिखाने के लिए फ़िरोज को मुँहमांगी कीमत देकर खरीद लिया। लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती तुम थे, जो हमीज़ का बफादार तो था ही और साथ ही साथ इंडिया का ड्रग्स किंग भी बनता जा रहा था और फिर फ़िरोज ने ऐसा चक्रव्यूह रचा जिसमें तुम लगातार फंसते गए। अश्फाक के कहने पर उसके राईट हैण्ड प्रधान ने खुद को तुम्हारे हवाले कर दिया। जिसकी मदद से तुम्हे पता चला की अश्फाक दिल्ली में छुपा है। उसे मारने के लिए तुम बड़ी आसानी से दिल्ली पहुँच गए और अश्फाक का काम और भी आसान कर दिया। दिल्ली में तुम्हें मारना उसके लिए आसान था पर तुमने उल्टा उसकी बीवी रेशमा को ही उसके घर से उठा लिया।

तुम्हारी इस हरकत से वह थोड़ा घबरा गया और सही समय का इन्तेजार करने लगा। जब तुमने रेशमा को सही सलामत छोड़ा तो वह समझ गया की तुम बेगुनाहों को नुक्सान नहीं पहुँचाते और इसी बात का फ़ायदा उठाकर उसने रेशमा की झूठी मौत का नाटक रचा ताकि तुम गुस्से में आकर कोई गलत कदम उठाओ और वह उसका फ़ायदा उठा सके, पर ऐसा हुआ नहीं, तुमने गुस्से में गलत कदम उठाने के वजाय बेख़ौफ़ को उठा लिया और फिर तुम्हे पता चला की अश्फाक महीने की आखरी तारीक़ को किसी मॉल में अशोक मेहरा से मीटिंग करने वाला है जहाँ तुम्हारी मुलाक़ात नैना से हुई। नैना का तुमसे मिलना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था। दरअसल नैना के चौबीसवें जन्मदिन पर सिकंदर अपनी आधी प्रॉपर्टी नैना के नाम करने वाला था। जब अश्फाक को इस बात का पता चला तो उसने एक तीर से दो निशाने लगाने का प्लान बनाया। उसे पता था की नैना हर महीने की आखरी तारीक को मॉल में होने वाले “हेल्पिंग हैंड्स” नामक चैरिटी फंक्शन में हिस्सा लेने जरूर जाती है। अश्फाक ने सोचा तुम्हारे साथ-साथ नैना को मारकर उसके सारे काम आसान हो जाएंगे और किसी को शक भी नहीं होगा, पर तुमने नैना को बचा लिया और अश्फाक को मौत के घाट उतार दिया। रेशमा अब भी जिन्दा है और दुबई में अपने 4 साल के बेटे फारुख के साथ रहती है।

कुछ दिनों बाद सिकंदर दिल्ली आया, अपने बेटे की मौत का बदला लेने पर जब उसे उसकी करतूतों के बारे में पता चल तो वह पीछे हट गया। उसने देखा नैना तुम्हारे साथ खुश थी, और वह यही तो चाहता था। नैना को तो पता भी नहीं था की उसका बाप अभी जिन्दा है।

मैं जानता हूँ यारा, मुझे ये सब पहले ही तुझे बता देना चाहिए था, पर तेरी हालत देखकर कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाया। मुझे माफ़ कर दे यार।

“नहीं रणजीते इसमें तेरा कोई दोष नहीं है…दगा तो अपनों ने ही कर दी…मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की फ़िरोज मेरे खिलाफ इतनी बड़ी साजिश रचेगा। उसको मारने का जो थोड़ा बहुत गम था आज उसका सच बता कर तूने वो भी कम कर दिया।”

“पर एक बात बता…तुझे ये सब बताया किसने” मैंने रणजीत को शक भरी निगाहों से देखते हुए कहा, ठीक वैसे ही जैसे हम मज़ाक करते वक्त देखते है।

रणजीत- ओ छोड़ यार बड्डी लंबी कहानी है…कभी फुरसत से सुनाऊँगा, फिलहाल तू ये तोहफ़ा देख जो पता नहीं किसने तेरे लिए भेजा है…तब तक मैं जाकर बच्चों के लिए बढ़िया वाला केक लेकर आता हूँ।

रणजीत ने अपने कमरे में जाकर एक तोहफा उठाया और मुझे देकर वहाँ से चला गया। उस पर किसी का नाम नहीं था। मैंने जैसे ही उसे खोला मेरी आँख से आँसू निकल पड़े, मैं भाग कर बाहर गया पर तब तक रणजीत जा चुका था। ये वही तस्वीर थी जो मैंने नैना के घर पर देखी थी, जिसमे उसने दो लोगों को बिछड़ते हुए दिखाया था पर आज वो दो लोग साथ थे। उसके पीछे एक चिट्ठी लगी हुयी थी मैंने उसे खोला और पढ़ना शुरू किया-

अर्जुन…

कैसे हो? बेशक मुझे ही याद कर रहे होगे। काश कुछ और वक्त मैं तुम्हारे साथ बिता पाती, पर किस्मत ने हमारा साथ शायद इतना ही लिखा था। मुझे माफ़ कर देना अर्जुन, मैंने अपने आखरी वक्त में तुम्हें मिलने नहीं बुलाया। कैसे बुलाती, मैं इतनी बदसूरत लग रही थी की तुम हँस-हँस कर पागल हो जाते। हर पल तुम्हारे साथ एक नयी जिंदगी जी रही थी मैं। अर्जुन, मैंने कहा था की कुछ कहानियाँ शायद हमेशा अधूरी ही रह जाती है, पर हमारी कहानी अधूरी नहीं रहेगी। कोई है जो अब भी तुम्हारा इन्तजार कर रहा है। शायद मैं तुम्हें वहीं मिलूँ। कुछ जिन्दा हूँ मैं अभी भी किसी में। मेरी धड़कने अभी भी तुम्हारे इन्तजार में कहीं धड़क रही है। मैं तुम्हे वहीं मिलूँगी जहाँ मैंने तुम्हारा साथ कभी न छोड़ने का वादा किया था।

मेरे आँसु थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मैंने बिना देर किए गाड़ी स्टार्ट की और नैना के घर के लिए निकल गया। कुछ देर बाद जब उसके घर पहुँचा तो देखा दरवाजा अन्दर से बंद था। मैंने घंटी बजाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया पर पता नहीं क्यों मैं एकदम से रुक गया। मैंने अपने कदम वापिस ले लिए और वहाँ से जाने के लिए जैसे ही मुड़ा, पीछे से किसी ने दरवाज़ा खोला और मुझे आवाज़ दी। मुझे लगा जैसे मैं इस आवाज़ को पहचानता हूँ, जो सालों पहले सुनी थी, पर उस आवाज़ में मेरे लिए आज भी वही प्यार था। “देविका” मैंने खुद से कहा और आँखें बंद कर ली।

पलटकर देखा तो देविका मेरे सामने थी, मानो जैसे उसे पता था कि मैं आने वाला हूँ। मुझे देखते ही वह मेरी बाँहों में समा गयी। पाँच साल पहले दफ़न हो चुका प्रेम एक बार फिर मेरे अन्दर पनपने लगा था। मैं उसके दिल में नैना की धड़कने महसूस कर सकता था। सच कहा था उसने, वह अब भी कहीं जिन्दा थी। शायद देविका में।

“आओ तुम्हें किसी से मिलवाती हूँ” देविका ने मुझे अन्दर ले जाते हुए कहा।

अन्दर जाते ही एक जाना पहचाना सा चेहरा मेरे मेरी आँखों के सामने था।

“हम पहले भी मिल चुके है शायद” मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।

“शायद तुम मुझे भूल गए अर्जुन, रेल्वे स्टेशन, फ़ाइल, कुछ याद आया” उसने हाथ मिलाते हुए कहा।

“नहीं भूला नहीं, बस सोचा नहीं था तुम यहाँ मिलोगे”

“ये आकाश है, मेरा सबसे प्यारा दोस्त और दिल्ली पुलिस का होनहार चेहरा” देविका ने उसका परिचय देते हुए कहा।

मतलब साफ़ था। चार साल पहले देविका के कहने पर ही आकाश ने मेरे खिलाफ जितने भी सबूत थे सब मिटा दिए थे। शायद वह तब भी मुझसे प्यार करती थी।

“जिंदगी कभी ख़त्म नहीं होती अर्जुन, हाँ थोड़ी देर के लिए रुक जरूर जाती है…अब तुम दोनों अपनी नयी जिंदगी की शुरुवात करो, मैं चलता हूँ और हाँ कभी कोई भी प्रॉब्लम हो बस एक फ़ोन कर देना” आकाश ने जाते हुए कहा।

देविका से मिलने के बाद हर सच से पर्दा उठ गया। चार साल पहले सरोजनी नगर मार्केट में हुए उस धमाके के बाद रणजीत नैना को हॉस्पिटल लेकर गया। नैना जिन्दा थी लेकिन बुरी तरह जल चुकी थी, उसके पास वक्त बहुत कम था। उसके कहने पर रणजीत ने मर चुके लोगों की लिस्ट में उसका नाम शामिल कर दिया क्योंकि वह जानती थी की मैं उसे ऐसी हालत में देखकर पूरी तरह टूट जाऊँगा। नैना ने रणजीत की मदद से देविका को ढूंढ निकाला पर देविका पिछले डेढ़ साल से दिल की बीमारी से जूंझ रही थी। नैना ने अपनी चैरिटी की मदद से अपनी जिंदगी देविका के नाम कर दी और जाने से पहले वह ख़त रणजीत को दिया और उससे कहा की सही वक्त आने पर मुझे दे दे।

देविका ने मुझे इसलिए छोड़ दिया था कि शायद सच जानने के बाद मैं जिन्दा नहीं रह पाउँगा और नैना मुझे इसलिए छोड़ कर चली गयी ताकि मैं फिर से जीना सीख सकूँ। अजीब कहानी थी मेरी। ना पूरी हुई ना अधूरी रही।

उस दिन के बाद रणजीत मुझे कभी नहीं दिखा। एक फ़रिश्ता बनकर आया था वह मेरी जिंदगी में, जो जाते-जाते भी मुझे ढेर सारी खुशियाँ दे गया।
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छह साल बाद-
1 नवंबर, 2015,

“कितना सारा काम बाकी है, सारे गेस्ट्स भी आते ही होंगे, तुमने अब्दुल को फ़ोन किया की नहीं? कहाँ पहुंच वो?” देविका ने हड़बड़ाते हुए कहा।

“वो अम्मी के साथ ही है बस थोड़ी देर में यहाँ पहुँच जाएगा, तुम थोड़ा आराम क्यों नहीं कर लेती” मैंने पानी का ग्लास उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।

“समय कितना तेज चलता है ना अर्जुन। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा की आज हमारी बेटी का चौथा जन्मदिन है”

“सच में देविका, पर मेरी छुटकी है कहाँ?” मैंने आस-पास नज़र दौड़ाते हुए कहा।

“रुको, अभी बुलाती हूँ….नैना!!!!” देविका ने उसे जैसे ही आवाज़ दी वह अपने छोटे-छोटे कदमो के साथ कमरे से बाहर आ गयी।

मैं उसके साथ खेलने में व्यस्त था तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। मैंने दरवाजा खोला तो कोरियर वाले ने मुझे एक बड़ा सा पार्सल थमा दिया। अन्दर आकर मैंने पार्सल खोल तो देखा उसमें कुछ खिलोने थे और एक डायरी जिसके पहले पेज पर कुछ लिखा हुआ था-

बेटी का जन्मदिन मुबारक हो अर्जुन…

कैसा है यारा? मुझे यकीन है तू देविका के साथ खुश होगा। सुनकर अच्छा लगा की तूने अपनी बेटी का नाम नैना रखा है, ऐसा लगता है जैसे वह फिर से इस दुनिया में वापिस आ गयी हो। मुझे याद तो करता है ना यारा..मुझे तो तेरी बहुत याद आती है। उस दिन बिना बतायें ही वहाँ से भाग आया, उसके लिए कान पकड़कर माफ़ी। यारा बहुत दिल करता है तेरे पास आने को, पर काम इतना है की निकल ही नहीं पाता। तू बस इसी तरह खुश रहना। नैना को मेरा ढेर सारा प्यार देना और जब वह बढ़ी हो जाए तो उसे हमारे बारे में जरूर बताना। जल्द मुलाकात होगी यारा।

-रणजीत बलदेव सिंह उर्फ़ सिकंदर मिर्जा

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