Arjun- Love story of a “Criminal” Part 3

“कितना ख़ूबसूरत लग रहा है ना” मैंने उसका ध्यान खींचने की कोशिश की।

“क्या?”

“वही जो तुम पूरे डेढ़ घंटे से निहार रही हो” मैंने ऊपर की ओर इशारा करते हुए कहा।

“ओह..वो तो बस नींद नहीं आ रही थी इसलिए। घर पर भी मुझे जब भी नींद नहीं आती या अकेला महसूस करती हूँ मैं दौड़कर छत पर जाती हूँ और फिर ऊपर देखते ही मेरा सारा अकेलापन दूर हो जाता है…..इतने सारे दोस्त जो मिल जाते है” उसने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए कहा।

“और तुम…क्या तुम्हें भी नींद नहीं आ रही….अपने दोस्तों के बारे में सोच रहे हो ना?”

“पता नहीं मेरे जाने के बाद वहाँ क्या हुआ होगा…कहीं उन्होंने अब्दुल को भी तो…नहीं वह ठीक होगा..उसने वादा किया था मुझसे हम फिर जरूर मिलेंगे” मैंने किसी तरह खुद को समझाने की कोशिश की।

“उपरवाले पर भरोसा रखो…सब ठीक हो जाएगा” उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखते हुए कहा।

एक पल के लिए तो ऐसा लगा…जैसे उससे कुछ पुराना रिश्ता है। वही बातें, वही स्पर्श नजाने क्यों मुझे किसी की याद दिला रहा था।

“अब क्या पूरी रात मुझे ऐसे ही घूरते रहोगे…रात बहुत हो चुकी है अब जल्दी से सो जाओ..सुबह यहाँ से निकलना भी तो है…अगर एक और दिन मैं यहाँ रुकी ना तो पागल हो जाउगी” उसने हँसते हुए कहा।

अजीब कला थी उसके अन्दर, अच्छे ख़ासे गम में डूबे इंसान की जिंदगी को भी खुशियों से भर सकती थी।

सूरज की पहली किरण पड़ते ही मेरी नींद खुल गयी..दिल्ली ने फिर से अपनी रफ़्तार पकड़ ली थी…मैंने देखा नैना अभी भी सोई हुई है…सूरज की हल्की रोशनी ने उसके मासूम चेहरे को और भी खूबसूरत बना दिया था। अगर हमें उस दिन वहाँ से निकलना ना होता तो मैं उसे जगाने की जुर्रत कभी ना करता, बल्कि इन्तजार करता की कब वह अपनी आँखे खोले और इस ख़ूबसूरत सुबह को और भी हसींन कर दे।

उसके जागते ही मैंने एक बैग में अपने कुछ कपड़े और पैसे रखे और दोनों वहां से निकल गए। जहाँ एक तरफ पुलिस का खतरा लगातार मेरे सिर पे मंडरा रहा था वही दूसरी ओर मुझे इस बात की चिंता थी की अगर फिरोज को इस सब के बारे में पता चला तो उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी।

“यहाँ से ऑटो ले लेते है” उसने मेरे विचारों की कड़ी को तोड़ते हुए कहा।

“कुछ कहा तुमने?….सॉरी वो मेरा ध्यान कही और था” मैंने बड़ी मासूमियत से कहा।

“अगर हम इसी तरह पैदल चलते रहे तो हमें घर पहुँचने में पूरा एक साल लग जाएगा…तुम्हे नहीं लगता हमें ऑटो कर लेनी चाहिए”..उसने हँसते हुए कहा।

उसके कहते ही मैंने एक ऑटो वाले से बात की और फिर हम दोनों उसमें सवार होकर निकल पड़े। करीब पच्चीस मिनट के लंबे सफ़र के बाद हम उसके घर पहुँचे। उसका घर साउथ दिल्ली के सबसे खूबसूरत और शांत इलाके में था। दरवाजा बाहर से लॉक था, नैना ने अपने पर्स में से चाबी निकालकर दरवाजा खोला और मुझे अन्दर आने के लिए आमंत्रित किया। घर में प्रवेश करते ही एक अजीब से सुकून का एहसास हुआ, जब से ड्रग्स की सप्लाई शुरू की तब से कोई ठिकाना ही नहीं था कभी किसी कमरे में तो कभी किसी में बस किसी तरह रात गुज़र जाया करती थी, हाँ अब्दुल की अम्मी जरूर कभी-कभी खाने पे अपने घर बुला लिया करती थी। माँ के बाद एक वही थीं जिन्होंने मजहब की दीवारों को दरकिनार करते हुए मुझे अपने बेटे जैसा प्यार दिया।

नैना का घर अलग-अलग तरह की कलाकृतियों से भरा पड़ा था, पर जिस चीज ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा वह थी सामने वाली दीवार पे लगी एक पेंटिंग। मैं जैसे ही उसकी तरफ बड़ा नैना बीच में ही बोल पड़ी-

“कॉलेज के दौरान बनायीं थी…पर नजाने क्यों ऐसा लगता है जैसे अब भी किसी चीज की कमी हो”

“हो सकता है जिन दो लोगों को तुमने इस तस्वीर में बिछड़ते हुए दिखाया है उनकी किस्मत में मिलना लिखा हो” मैंने पलटते हुए कहा।

“हो सकता है…लेकिन जरुरी तो नहीं की हर कहानी के अंत में मिलना ही लिखा हो…कुछ कहानियाँ हमेशा अधूरी रह जाती है…कभी वक्त नहीं मिलने देता तो कभी जिन्दगी”।

“खैर जाने दो…ये बताओ खाने में क्या खाओगे?” उसने मेरी तरफ एक सेब उछालते हुए कहा।

“कोई चॉइस भी है या सिर्फ दिल बहलाने के लिए पूँछ रही हो” मैंने छेड़ते हुए कहा।

“वेल मुझे नहीं लगता किचन में आलू के अलावा कुछ भी होगा…वट ट्रस्ट मी, मैं मसाला आलू बहुत अच्छे बनाती हूँ”।

“ठीक है…वैसे भी जिंदगी में इतना कुछ बुरा हो ही रहा है, ये बेचारे मसाला आलू मेरा क्या बिगड़ लेंगे” मैंने हॉल में रखी टेबल पर अपना बैग रखते हुए कहा।

“कुछ कहा तुमने” उसने आँखें चढ़ाते हुए कहा

“नहीं मैं तो बस बोल रहा था कि घर में जो कुछ भी हो बना लो, मैं खा लूँगा”

“हम्म…एक काम करो..ऊपर मेरे कमरे में जाकर मुँह-हाथ धुल लो तब तक मैं खाने की तैयारी लगाती हूँ”

ऊपर कमरे में पहुँचते ही सबसे पहले मैंने अपनी जेब से फ़ोन निकाला और अब्दुल का नंबर डायल किया, उसका फ़ोन बंद था। एक अजीब सा डर मेरे अन्दर घर करने लगा। अगर बात सिर्फ मेरी होती तो शायद मैं इतना कमजोर नहीं पड़ता पर मेरे साथ-साथ दो और जिंदगियां दाव पर लगी थी; अब्दुल और नैना। इतना तो तय था की सिकंदर अपने बेटे की मौत का बदला लेने के लिए कोई न कोई कदम जरूर उठाएगा, पर कब ये कोई नहीं जानता था।

दोपहर होते ही हमने खाना खाया और साथ ही साथ खूब हँसी मज़ाक भी किया और फिर आराम करने के लिए में वापिस नीचे हॉल में आकर लेट गया। नैना खुश थी बेहद खुश, शायद वह मुझमे एक साथी की झलक देख रही थी जो उसके जीवन के अकेलेपन को दूर कर सकता था। जो ताउम्र उसे इसी तरह हँसा-हँसा कर खुश रख सकता था। पर यह संभव नहीं था। जितने भी लोग मेरी जिंदगी में आए सबने वक्त से पहले मुझे अलविदा कह दिया, पहले बाबा फिर माँ और अब सरताज, पता नहीं ये सिलसिला कब रुकने वाला था। अगर मेरी वजह से नैना को जरा सी खरोंच भी आती तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता। उसी पल मैंने निश्चित कर लिया की अगले दिन सुबह होते ही मैं वहाँ से निकल जाऊँगा। शायद नैना ने सच ही कहा था “कुछ कहानियाँ हमेशा अधूरी ही रह जाती है”।

रणजीत- किस्मत भी कैसे-कैसे खेल खेलती है, पर क्या तुम इस बात को लेकर निश्चिन्त थे की तुम्हारे जाने के बाद नैना सुरक्षित रहेगी।

“शायद हाँ, नैना को मेरे साथ सिर्फ अश्फाक और उसके आदमियों ने ही देखा था, अश्फाक को तो मैंने मार ही दिया था और रही बात उसके आदमियों की तो मुझे नहीं लगता था की उनमे से कोई भी नैना तक पहुँच पायेगा। हाँ लेकिन अगर मैं कुछ समय और नैना के पास रुकता तो दिल्ली पुलिस जरूर मुझे ढ़ूढ़ते हुए उसके घर तक पहुँच जाती, इसलिए नैना के लिए सबसे बड़ा खतरा सिकंदर या उसके आदमी नहीं बल्कि मैं खुद था।

रणजीत- आगे क्या हुआ?

शाम हो चुकी थी पर मैं अभी भी सोने में मग्न था, थोड़ी देर बाद मुझे महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरे कान में कुछ डालने की कोशिश की हो। मुझे माजरा समझने में देर नहीं, मैंने करवट ली और एकदम से नैना का हाथ पकड़ लिया। मेरी इस हरकत से वह खबरा गयी। मैंने आँखें खोल कर देखा तो वो जोर जोर से साँस ले रही थी, उसकी हालात देखकर मेरी हँसी निकल गयी।

“ऐसे कोई किसी को डरवाता है क्या” उसने अपनी साँस थामते हुए कहा।

“अच्छा बच्चू…और तुम जो ये अपने बालों की लट बार-बार मेरे कान में डाल रही थी उसका क्या?” मैंने हँसते हुए कहा।

“वो तो सिर्फ तुम्हें जगाने के लिए…मैं यहाँ कब से बोर हो रही हूँ और तुम हो की खर्राटें मार के सोये जा रहे हो उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे” उसने आवाज़ को जोर देते हुए कहा।

“नींद ही तो नहीं आ रही थी मुझे…तुम्हारे बारे में जो सोच रहा था” मैंने खुद से बड़बड़ाते हुए कहा।

“क्या कहा तुमनें…मेरे बारे में सोच रहे थे” उसने अपने दोनों हाथ कमर पर रख लिए।

“नहीं वो मैं…मैं सोच रहा था की कितने अच्छे मसाला आलू बनाये तुमने…अब चार दिन भी खाना नहीं मिला तो चलेगा” मैंने बात घुमाते हुए कहा।

“अच्छा बेटा..अभी दो दिन भी नहीं हुए और तुम शुरू भी हो गए..अगर तुम क्रिमिनल हो तो मैं भी डॉक्टर हूँ…याद रखना” उसने चिढ़ाते हुए कहा”

“यूँ ही बात करते-करते कब रात ने दिल्ली को अपनी आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला। कुछ बातें नैना ने अपने बारे में बाताई तो अपनी जिंदगी के कुछ पन्ने मैंने भी खोल दिए।

“तुम्हारे कमरे में एक तस्वीर देखी। “हेल्पिंग हैंड्स” क्या चीज है ये” मैंने थोड़ी गंभीर स्वर में कहा।

“ये एक चैरिटी है, जो मेरी मोम ने शुरू की थी। कल मॉल उसी में शामिल होने तो गयी थी मैं”।

“अच्छा चलो मैं तुम्हें किसी से मिलवाती हूँ” अचानक से उसने खड़े होते हुए कहा।

“मगर किससे…तुम्हारे अलावा कोई और भी रहता है क्या यहाँ” मैंने आश्चर्यचकित होकर पूँछा।

“अरे तुम आओ तो सही” उसने मेरा हाथ पकड़ा और खींचकर छत की ओर ले जाने लगी।

ऊपर पहुँचते ही उसने छत पर बने बगीचे में लगे फूलों की तरफ इशारा किया और उनका इंट्रोडक्शन देने लगी ठीक वैसे ही जैसे हम किसी इंसान का देते है ” ये चंटू है..ये मंटू और ये बबलू अभी नया-नया हुआ है ना इसलिए इतना शरमा रहा है। मैं वहाँ स्तब्ध खड़ा सब देख रहा था। जिंदगी जीने के नए मायने सिखा रही थी नैना मुझे।

“और ये है तुम्हारी फैमिली” मैंने आँखें चोंड़ी करते हुए कहा। जैसे हम अत्यधिक खुश होने पर कर लेते है।

“जी हाँ…जानते हो अर्जुन मैंने अपनी जिंदगी में ज्यादा दोस्त क्यों नहीं बनाये, सिर्फ इसलिए, क्योंकि बहुत सी ऐसी चीजे है जो हमारा साथ चाहती है। जो हमसे बिना कुछ लिए हमें बहुत खुश रख सकती है, बिना किसी स्वार्थ के।

नैना की सादगी इस बात का सबूत थी की उसकी सिर्फ सूरत ही नहीं सीरत भी उतनी थी लाजवाब थी।

“तुम्हें भी सबकी बहुत याद आती होगी ना? माँ, बाबा, घर” उसने धीरे से कहा।

“हाँ…बहुत ज्यादा” एक हल्की सी मुस्कान के साथ मैंने जवाब दिया।

“और देविका”

अचानक उसके मुँह से देविका का नाम सुनकर में सुन्न रह गया। मैंने जैसे ही अपनी पेंट की पीछे वाली जेब में हाथ डाला तो पाया मेरा पर्स उसमें नहीं था। फिर मुझे याद आया की पर्स तो नैना के कमरे में ही रह गया है। शायद उसने वह ख़त पढ़ लिया था जो मैंने आखरी बार देविका के लिए लिखा था पर कभी उस तक पहुँचा नहीं पाया।

“तुमने जवाब नहीं दिया?” उसने फिर पूँछा।

क्या बोलता मैं, पर चुप भी तो नहीं रह सकता था। उसे कैसे समझाता की देविका सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि जिंदगी थी मेरी। इससे पहले की आँसुओं का एक सैलाब आता और मेरा गाला रुंध जाता मैंने बोलना शुरू किया-

“एक और थी…बिल्कुल तुम्हारी ही तरह, जमीन से जुड़ी हुई…जो पलक झपकते ही किसी को भी अपनी सादगी का कायल कर सकती थी ‘देविका’। हम दोनों एक ही कॉलेज में पड़ते थे। मैं कॉलेज के पहले दिन से ही उसे पसंद करता था पर उससे बात करने का कभी कोई बहाना नहीं मिला।

To be continued..


Amit Khare

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