Arjun: Love story of a “Criminal”  Part-2

तीन दिन बाद आखिरकार उसकी मौत का दिन आ गया। मॉल पहुँचकर हमने सबसे पहले उन जहगों की तलाश शुरु की जहाँ बैठकर मीटिंग की जा सकती थी। मॉल के अन्दर सिर्फ दो रेस्टॉरेंट्स ऐसे थे जहाँ वे इस काम को अंजाम दे सकते थे। मैंने एक में सरताज को भेजा और दुसरे में अब्दुल को और खुद ग्राउंड फ्लोर पर अशोक और अश्फाक का बेसब्री से इन्तजार करने लगा।

रणजीत- क्या फिरोज और हमीज़ को इस सब के बारे में पता था।

नहीं फिरोज को सिर्फ इतना पता था की मुझे अश्फाक की तलाश है। मैंने सोचा एक बार काम को अंजाम दे दूं फिर यह खुशखबरी मुम्बई जाकर ही दूँगा।

रणजीत- फिर क्या हुआ?

मैं नीचे अश्फाक का इन्तजार कर रहा था तभी अचानक पीछे से किसी ने मुझे आवाज़ दी-

“एक्सक्यूज़ मी प्लीज मेरी हेल्प कीजिये” इन पांच शब्दों से शुरू हुई मेरी और नैना की कहानी। अर्जुन और नैना की कहानी। मैंने पलटकर देखा तो सफ़ेद कुर्ती और नीली जीन्स में एक लड़की अपने दोनों हाथों में बड़े-बड़े शौपिंग बैग्स लेकर खड़ी थी। मेरे पलटते ही उसने कहा-

“प्लीज ये बैग्स बाहर ऑटो तक रखने में मेरी हेल्प कर दीजिये”

बेशक़ मुझे इतनी देर से फ़ालतू खड़ा देखकर ही उसके दिमाग में मेरी मदद लेने का ख्याल आया होगा या हो सकता है उसने मुझे दिल्ली का दिलवाला मुंडा समझ लिया हो, ख़ैर जो भी हो अश्फाक को ना आता देखकर मैं उसकी मदद करने के लिए तैयार हो गया।

मैं जैसे ही उसे ऑटो तक छोड़ने के लिए बाहर निकला अचानक तीन काले रंग की गाड़िया मॉल के सामने आकर रुकी। मुझे कही न कही शक हुआ की ये गाड़ियां अशोक मेहरा और अश्फाक की ही है। इससे पहले की मैं कुछ समझ पाता, गाड़ी से उतरते ही अश्फाक के आदमियों ने मुझ पर फायरिंग शुरू कर दी। मैंने नैना को कवर करते हुए अपनी गन निकाली और उन पर जवाबी फायरिंग करने लगा। उन्होंने नैना को मेरे साथ देख लिया था और उसे मेरी कमजोरी समझकर उस पर गोली चलाने की कोशिश कर रहे थे। मैं किसी तरह उसको बचाने की कोशिश करने लगा। गोलियों की आवाज़ सुनकर अब्दुल और सरताज भी नीचे आ गए और उन्हें मुँह तोड़ जवाब देने में मेरा साथ देने लगे। चारों तरफ गोलियों की आवाज़ सुनकर अफरा-तफरी मच गयी। जहाँ एक ओर हम मासूम लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे थे वहीं दूसरी ओर अश्फाक और उसके आदमी अपने रास्ते में आने वाले हर इंसान को गोलियों से भूनते जा रहे थे।

ये सब देखकर सरताज खुद को काबू में ना कर सका और फायरिंग करते हुए उनके ठीक सामने जा पहुँचा। उन हरामजादों ने मेरी आँखों के सामने उसके सीने को गोलियों से छल्ली कर दिया और मैं कुछ ना कर सका। सरताज को आँखों से सामने तड़पता देख मैं पागल सा हो गया। मैंने अपनी जगह से हिले वग़ैर दो गोलियां फायर की जिसमें से एक जाकर सीधे अश्फाक के माथे पर लगी और दूसरी सीने में और इस तरह अश्फाक की जिंदगी का चैप्टर मैंने हमेशा के लिए क्लोज कर दिया। मैं जैसे ही सरताज की तरफ बढ़ा अब्दुल ने मुझे रोक लिया।

“तू इस लड़की को लेकर यहाँ से निकल इन्हें मैं संभालता हूँ” अब्दुल ने मुझे और नैना को कवर करते हुए कहा।

“नहीं मैं तुझे अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाला…मैंने अपना एक दोस्त तो खो दिया लेकिन अब मैं तुझे कुछ नहीं होने दूँगा”।

“अर्जुन तू मेरी चिंता मत कर.. अगर खुदा ने चाहा तो हम फिर से जरूर मिलेंगे…तू बस यहाँ से निकल…खुदा हाफिज़।

नैना का हवाला देते हुए अब्दुल ने मुझे वहाँ से जाने के लिए मजबूर कर दिया। अश्फाक के बफादार कुत्ते कुछ दूर तक हमारा पीछा करते रहे पर हम उन्हें चकमा देने में कामयाब रहे।

हम दिल्ली के एक इलाके में स्थित हमारे पुराने मकान में पहुँच गए। शहर से थोड़ी दूर और सुनसान इलाके में होने के कारण पुलिस का वहाँ पहुँच पाना नामुमकिन था। नैना काफी घबराई हुई थी और मेरे कंधे में धसी गोली के कारण लगातार खून बह रहा था जिसे देखकर वह और भी घबरा गयी।

नैना- तुम्हें तो गोली लगी हुई है।

“ये तो रोज का काम है” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

पर उसका ध्यान मेरी मुस्कराहट से ज्यादा बार-बार मेरे कंधे में उठ रहे दर्द की तरफ गया और उसने अलमारी में पड़े एक कपड़े को उठाया और कस कर मेरे कंधे से बाँध दिया।

मैंने किचन की ओर इशारा करते हुए उसे एक मोमबत्ती और चाकू लाने के लिए कहा। माँ के जाने के बाद पहली बार किसी ने इतने प्यार से मुझे स्पर्श किया था, कुछ तो बात थी उसमें। वह जैसे ही किचन से वापिस लौटी मैंने उसके हाथ से मोमबत्ती ली और अपनी जेब से लाइटर निकालकर उसे जला दिया। अब बारी थी नैना की। मैंने जैसे ही उसकी तरफ देखा वह बिन बोले ही सब कुछ समझ गयी। उसने चाक़ू गरम की और अपने कंपकपाते हाथ से मेरे कंधे में लगी गोली निकालने लगी। करीब 5 मिनट बाद उसने गोली निकाल कर घाव जला दिया, अब मुझे पहले से बेहतर महसूस हो रहा था।

“अर्जुन”…मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।

“नैना”…उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया जो की अभी भी काँप रहा था।

तुम्हारा हाथ तो अभी भी काँप रहा है। लगता है पहली बार इस तरह का ऑपरेशन किया है।

“हाँ..पहली बार किसी क्रिमिनल से जो पाला पड़ा है।”

उसके इतना कहते ही हम दोनों हँस पड़े। मुझे तो ठीक से याद भी नहीं था मैं आखिरी बार कब हँसा था। धंधे में इन सब चीजो के लिए वक्त ही कहाँ था। पर उस दिन मैं जी खोलकर हँसना चाहता था। किसी छोटे बच्चे की तरह। ठीक वैसे ही जैसे अर्जुन बचपन में हँसा करता था, ना किसी काम के पूरे होने का डर और ना ही किसी डिलीवरी की चिंता।

“मतलब डॉक्टर साहिबा हँसती भी है..क्या बात है” मैंने उसके हँसते हुए चेहरे को देखते हुए कहा।

“जी हाँ…पर तुम्हें कैसे पता की मैं डॉक्टर हूँ”

“अब जिस तरह से तुमने मेरा इलाज किया, ये तो सिर्फ किसी डॉक्टर के बस की ही बात है”

“हवा में तीर छोड़ा था। वो तो किस्मत ने साथ दिया इसलिए निशाने पे लग गया” उसने छेड़ते हुए कहा।

“अब हवा में ही सही..खैर छोड़ो इससे पहले की रात हो मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ, ख़ामोखां तुम्हारे घरवाले चिंता में होंगे।

मेरे इतना कहते की एक अजीब सा सन्नाटा कमरे में पसर गया। नैना वहाँ से उठकर खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गयी। उसकी खामोशी और सिसकियों ने एक ऐसे दर्द से पर्दा उठा दिया था जिससे गुजरना किसी के लिए भी आसान नही हो सकता। फिर भी उसे दिलासा देने के लिए मैं उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा-

“मुझे माफ़ कर दो, कुछ जाने वगैर ही मैंने…”

“इससे तुम्हारी कोई गलती नहीं…कभी कभी जिंदगी बेवजह ही हमसे बहुत कुछ छीन लेती है, और हम चाहकर भी उससे दूर नहीं भाग पाते” उसने किसी तरह खुद को सँभालते हुए कहा।

उस वक्त उसके दर्द को मुझसे बेहतर कौन समझ सकता था। जिसने हर मोड़ पर माँ-बाप की कमी को महसूस किया हो। रात होने को थी और ऐसी परिस्थिति में नैना को अकेला छोड़ना खतरे से खाली नहीं था। हमने तय किया की सुबह होते ही हम वहाँ से निकल जाएँगे। बचे हुए सामान से किसी तरह हमने रात के खाने का इंतजाम किया और क्योंकि कमरे की हालत बहुत ख़राब थी इसलिए हमने छत पर सोना तय किया।

आसमां सितारों से पूरी तरह सज चुका था। मैंने दोनों के लिए बिस्तर लगाए और अपनी जगह पर लेटकर सोने की नाकाम कोशिश करने लगा। मैं जितनी बार सोने की कोशिश करता सरताज का तड़पता हुआ चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता और अगले ही पल हवा का एक झोंका मुझे जागने पर मजबूर कर देता। मैंने जैसे ही करवट ली तो देखा नैना अभी भी जाग रही थी। शायद मेरे द्वारा कही गयी बात ने उसकी जिंदगी के किसी ऐसे पन्ने को खोल दिया था जिसमे दर्द के अलावा और कुछ नहीं था। पर इस बार मैंने दिलासा देना ठीक नहीं समझा, शायद किसी को बार बार दिलासा देकर भी हम उसके ज़ख्मो को और गहरा कर देते हैं।

To be continued…


By Amit Khare

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