ArJuN: love story of a “Criminal”

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3 फ़रवरी 2009-

आज उसका 28वां जन्मदिन था और मैं सुबह से ही तैयारियों में व्यस्त था। आज का अपना पूरा दिन में उन गरीब बच्चों के साथ बिताने वाला था जिनका या तो इस दुनिया में कोई नहीं था या फिर उनके अपने उन्हें भूल चुके थे। नजाने क्यों मुझे अपनी कहानी भी कुछ उनकी ही तरह लगती थी। खैर जो भी हो, कम से कम इस एक दिन मैं पूरी कोशिश करता था की उन्हें खुश रख सकूँ और वो भी मेरे पास आकर अपना सारा अकेलापन भूल जाते थे।

“चैरिटी के लिए चेक दिया कि नहीं?” मैंने रणजीत की तरफ देखते हुए कहा।

रणजीत मेरे साथ मेरे ही घर में रहता था। चार साल पहले वह काम के सिलसिले में दिल्ली आया था, उसे काम तो नहीं मिला पर मुझे उसका साथ जरूर मिल गया। हालांकि वह उम्र में मुझसे बड़ा था पर मेरे लिए वह एक दोस्त से भी बढ़कर था। हम दोनों ने साथ में एक छोटे से बिज़नेस की शुरुवात की जो आज एक बड़े कारखाने में तब्दील हो चुका था।

“यारा मैंने चेक तो भेज दिया पर आज तुझे बताना पड़ेगा आखिर क्या है ये “हेल्पिंग हैंड्स” जिसमे हर साल तू अपनी पूरी कमाई दान कर देता है….और कौन है ये लड़की जिसकी तस्वीर तूने घर के हर हिस्से में लगा रखी ही….हर साल तू जिसका जन्मदिन मनाता है…आज मुझे सब जानना है तेनु रब दा वास्ता।”

आज फिर रणजीत का एक ही सवाल था जो वह पिछले चार सालों से मुझसे पूँछता आ रहा था। हर बार की तरह इस बार भी वह जैसे ही मेरी खामोशी को मेरी ना समझकर जाने के लिए खड़ा हुआ मैंने उसे रोक लिया। उस दिन शायद मैं भी यही चाहता था, आखिर कोई तो हो जो मेरी कहानी को जिन्दा रख सके। जो मेरे प्यार, मेरी सच्चाई को जिन्दा रख सके और फिर मैंने शुरू की जुर्म प्यार और रहस्य से भरी एक ऐसी दास्तान जिसने मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल दी।

4 साल पहले, अप्रैल 2005-

मैं साउथ एशिया के सबसे बड़े ड्रग माफिया डॉन हमीज़ कादिर के राईट हैण्ड फिरोज के लिए काम करता था। हमीज़ का दबदबा पूरे साउथ एशिया पर था। फिरोज मुम्बई से ऑपरेट करके इंडिया पर हमीज़ की हुकूमत को बरक़रार रखे था। मेरा काम था इंडिया के अलग- अलग हिस्सों में ड्रग सप्लाई करना और साथ-साथ हमारे काम में टांग अड़ाने वालो को ठिकाने लगाना। दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, बैंगलोर सब जगह हमारा नेटवर्क तेजी से फ़ैल रहा था। लेकिन हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती था सिकंदर। सिकंदर और हमीज़ पहले पार्टनर्स हुआ करते थे फिर उनके साथ भी वही हुआ जो आमतौर पर सबसे साथ होता है। दोनों के बीच पैसों को लेकर झगड़ा हुआ और दोनों ने अपना अलग अलग बिज़नेस शुरू कर दिया। लेकिन हमीज़ की शुरू से ही ड्रग माफिया पर पकड़ होने के कारण वह जल्दी सफल हो गया और पूरे साउथ एशिया में उसका सिक्का चलने लगा और सिकंदर कुछ समय के लिए गायब हो गया। लेकिन उसका वापिस आना तय था और इस बात का एहसास हमें तब हुआ जब हमें पता चला की हमारे ही माल को कोई हमसे खरीदकर उत्तरप्रदेश और बिहार के अलग अलग हिस्सों में महंगे दामों पर बेच रहा है और फिर हमारे हाथ लगा सिकंदर के बेटे अश्फाक का राईट हैण्ड प्रधान। सिकंदर दुबई से ऑपरेट कर रहा था और उसका बेटा अश्फाक दिल्ली के किसी कोने में छुपा बैठ था जिसके बारे में खुद प्रधान को भी कुछ पता नहीं था। प्रधान को गोली मारते ही हमने उत्तरप्रदेश और बिहार में फैले उनके नेटवर्क को लगभग तोड़ ही दिया था। अब हमें खोज थी अश्फाक की और अश्फाक की खोपड़ी में 6 की 6 गोलियां उतारने का काम मुझे सौंपा गया।

रणजीत- यारा ये सब तो ठीक है पर तूने एंट्री कैसे की ड्रग माफिया में, मेरा मतलब कोई तो बजह रही होगी।

वही पुरानी फिल्मी कहानी, माँ को ब्लड कैंसर था और इलाज के लिए जल्द से जल्द 25 लाख रूपए की जरुरत थी। इतना पैसा कमाने का सिर्फ एक ही रास्ता था जो जुर्म की दुनिया से होकर गुज़रता था और फिर मेरी मुलाकात हुई अब्दुल और सरताज से, दोनों फिरोज के लिए काम करते थे और इनके जरिये में फिरोज से मिला। पैसों की जुगाड़ तो हो गयी पर माँ चल बसी। मैं चाहता तो माँ के जाने के बाद ये काम छोड़ सकता था, लेकिन इस धंधे में एक उसूल होता है “काम खत्म मतलब आदमी खत्म” और फिर नशे और पैसों की लत इतनी आसानी से नहीं छूटती और मुझे तो दोनों ही एक साथ मिल रहे थे। हमने कॉलेज स्टूडेंट्स और अकेले रहने वाले लोगों को टारगेट करना शुरू किया और इस तरह मैं, अब्दुल और सरताज लगातार आगे बढ़ते रहे और धीरे-धीरे फिरोज के ख़ास आदमी बन गए।

रणजीत -अश्फाक का क्या हुआ फिर?

होना क्या था, अश्फाक को उसकी औकात दिखाने मैं अब्दुल और सरताज के साथ दिल्ली पहुँच गया लेकिन उसका पता लगा पाना मुश्किल हो रहा था। उसको बिल से बाहर लाने के लिए हमने फरीदाबाद स्थित उसके घर से उसकी बेगम रेशमा को उठा लिया, लेकिन हमारा दाव हम पर ही उल्टा पड़ गया। अश्फाक को रेशमा से कोई हमदर्दी नहीं थी। उसे बचाने के लिए ना तो उसने कोई कदम उठाया और ना ही अपने बिल से बाहर निकला, लेकिन हमारी इस हरकत की वजह से वह चौकन्ना जरुर हो गया था। रेशमा माँ बनने वाली थी मजबूरन हमें उसे सुरक्षित छोड़ना पड़ा।

रणजीत- मतलब अश्फाक बच निकला।

हाँ, वह ज़िंदा तो बच गया लेकिन मैं भी चुप बैठने वालों में से नहीं था। फ़िरोज़ ने हमें कुछ दिन दिल्ली में ही रुकने के लिए कहा। वह इस बात को सुनिश्चित करना चाहता था की कहीं फिर से उसके पर ना निकलने लगें। फिरोज के कहने पर मैं अब्दुल और सरताज के साथ दिल्ली में रुका रहा। करीब एक हफ्ते बाद मुझे पता चला की अश्फाक ने पकड़े जाने के डर से अपनी बेगम रेशमा को मौत के घाट उतार दिया। खबर मिलते ही मेरे गुस्से का कोई ठिकाना ना रहा, ड्रग्स के मसले में मैं शायद उसे माफ़ भी कर देता लेकिन अब उसकी मौत मेरे हाथों तय थी।

दिल्ली में हमारी मुलाकात हुई बेख़ौफ बादशाह से, सुनने में नाम जितना अजीब था उतना ही शातिर दिमाग था बेख़ौफ का। छोटी-मोटी चोरी करके सामान को चोर बाज़ार में बेंचकर अपना पेट पालता था और फिर एक दिन अपने ही मालिक भवानी को मारके सट्टा बाजार का बादशाह बन गया और इस तरह बेख़ौफ बन गया बेख़ौफ बादशाह। बेख़ौफ से मिलने पर पता चला की अश्फाक को अपने बाप सिकंदर का पैसा बर्बाद करने का कुछ ज्यादा ही शौंक था। टेस्ट मैच हो या वन डे, अश्फाक लाखों रुपये का सट्टा लगाने हर बार तैयार रहता था। ठीक तीन दिन बाद इंडिया और पकिस्तान के बीच मैच होने वाला था और मुझे यकीन था कि अश्फाक पैसा लगाने के लिए बेख़ौफ से संपर्क जरूर करेगा मगर ऐसा हुआ नहीं। गुस्से में आकर मैंने बेख़ौफ की खोपड़ी पर बन्दूक तान दी और उससे कहा की वह अभी अश्फाक को उससे मिलने के लिए यहाँ बुलाए।

उसने अश्फाक को फ़ोन लगाया तो पता चला की इस महीने की आखरी तारीक को वह दिल्ली के एक मॉल में जाने माने प्रॉपर्टी डीलर अशोक मेहरा से मिलकर कोई डील करने वाला है। अब समय आ गया था अश्फाक को इस दुनिया से विदा देने का। बेख़ौफ को उसके ही घर में दफना कर हम वहाँ से निकल गए। काम ख़त्म मतलब…

रणजीत- आदमी खत्म। आगे क्या हुआ?

To be continued…



A Story by- Amit khare

Mail me @khareamit13@gmail.com

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